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सूखे की मार

  यह लेख समाचार जगत में प्रकाशित हुआ था  

जानिए, जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का साधन

सृष्टि की उत्पत्ति से पहले केवल एक अति सूक्ष्म सर्वव्याप्त चेतना थी। यह चेतना ‘आदि शक्ति’ के रूप में प्रकट हुई और उनके हिरण्यगर्भ से सभी कुछ उत्पन्न हुआ। इस सृष्टि के संचालन के लिए आदि-शक्ति ने स्वयं को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में तथा इस संसार को मूर्त रूप देने के लिए "जड़ प्राण  (वायु, जल , आकाश, पृथ्वी और अग्नि) और चेतन प्राण के रूप में प्रकट किया। ब्रह्माजी ने इसकी संरचना का कार्य भार संभाला, विष्णुजी ने इसके पालन पोषण का और भगवान शिव ने इसके परिवर्तन का। यही ‘प्राण’ विभिन्न आवृतियों के परिकम्पन पर स्थित हो कर इस ब्रह्माण्ड के हर पदार्थ को भिन्न रूप प्रदान करते है। मनुष्य में यह प्राण, सूक्ष्म चक्रों के रूप में ऊर्जा केंद्र निर्मित करते है। प्रत्येक चक्र उस व्यक्ति विशेष की मानसिक, आर्थिक, शारीरिक और आध्यात्मिक स्तर का द्योतक है।  विष्णु की 'माया' शक्ति द्वारा ही सभी आत्माएं इस सृष्टि के कर्म चक्र से बंधी रहती हैं किन्तु जिन आत्माओं को इस भौतिक संसार की निरर्थकता का अनुभव हो जाता है, वह महादेव अर्धनारेश्वर की कृपा से इस सृष्टि के आवागमन से बाहर हो जाती...

जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति हेतु करें ऐसा कार्य

जब पुरुष(आत्मा) प्रकृति(सृष्टि) के साथ-सत्त्व, राजस और तम- इन तीनों गुणों के रूप में जुड़ जाता है तब सृष्टि में एक जीव का जन्म होता है। प्रकाश, आनंद और ज्ञान यह  सारे सत्त्व गुण के लक्षण होते हैं, इच्छाएं, आसक्ति और उससे जुड़े कर्म राजस गुण के लक्षण होते हैं और अंधकार, अज्ञान और निद्रा ये तम गुण के लक्षण होते हैं। मनुष्य में उसकी इच्छाओं और आत्मिक उन्नति के स्तर के आधार पर कम/अधिक मात्रा में ये तीनों गुण पाएं जाते हैं। आम लोग तम गुण के प्राबल्य के आधीन होते हैं, जो कि पशुओं और अन्य नीच योनि के जीवों में भी मुख्य रूप से पाया जाता है। भगवद गीता के अनुसार जब कोई इंसान अपना शरीर तम गुण के आधीन होकर छोड़ता है, तो उसका अगला जन्म पशुओं की योनियों में होता है और वह नर्कों में प्रवेश करता है। इसी कारण से तम गुण को कम कर हमें सत्त्व और राजस गुण की मात्रा खुद में बढ़ाने का प्रयास सन्तानक्रिया के द्वारा  करना चाहिए। मनुष्य में जब राजस गुण का प्राबल्य होता है तो वह उत्साह से अपनी भौतिक इच्छाओं तथा आसक्तियों को पूरा करने के लिए कर्म करने हेतु प्रवृत्त होता है। हर कर्म से उसकी समान और वि...

ऐसे कार्य न करें अन्यथा नरक आपकी प्रतीक्षा कर रहा है

किसी भी अन्य वस्तु की तरह सृष्टि सुव्यवस्थित रूप से यथाक्रम है, वस्तुतः कुछ मौलिक नियमों पर आधारित है। जिसका किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। कर्मो का नियम प्रधान होता है, यहां तक कि देव-देवियां जो क़ि इस सृष्टि को चलाते हैं, खुद भी इस नियम से बंधे हुए हैं। तथापि आधुनिक मनुष्य सृष्टि से ऊपर अपनी प्रधानता दर्शाता है और मूर्खतापूर्वक अपने लिए काल्पनिक संसार का निर्माण करने हेतु सृष्टि के नियमो क़ी उपेक्षा करता है, फलतः पतन के चक्र में फंस जाता है।भगवद गीता में भी कर्मों के नियमों की अचूक मान्यता का वर्णन है। सर्वोत्कृष्ट कथन 'आप जो बोएंगे, वही काटेंगे' कर्मों के नियम कि इस अवधारणा को साकार करता है। नरक की यात्रा से बचने के लिए जरूर करें ये दान प्रत्येक कार्य एवं कर्म आपको चाहे कितना भी तुच्छ प्रतीत हो परंतु उसका फल आपको जरूर मिलता है। चूंकि प्रत्येक कार्य का प्रारंभ एक विचार से होता है इसलिए ये आपकी विचार प्रक्रिया ही है जो एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से भेद कराती है। आपकी चिंतन प्रक्रिया या तो स्वार्थी होगी या निष्काम। निष्काम कर्म आपको सृष्टि की रक्षा एवं पालन क...

Saffron Under Siege

As early as the Treta Yug, asurs have tried to disrupt creation. Disruption of creation is inevitable. Mahapralay is a natural follow-through of creation and asurs have an important role to play in it. Without the asurs, mahapralay cannot happen, and a new beginning cannot be made. Everything in creation is cyclical, nothing is linear. There is childbirth, death and rebirth. The sun rises and sets to rise again. A seed gives rise to a tree, which produces more seeds for more trees. Moon follows a cycle, as does water. The cyclical pattern is seen in human evolution, too. Lighter thoughts, thoughts for creation and selfless actions make one rise, and heavier thoughts, asuric disposition put one on the descending cycle. There is a limit to how much you can rise or fall, and that depends on the influence asurs and devas have in your life. Ravan, for instance, ascended to be one of the greatest pandits of all times who extemporaneously created the Shiv Tandav Stotram, to perfect w...

Live in the present, save your Prana

In the last article, we had discussed how agnis in the body get activated by the basic acts of breathing and eating and how they trigger wear and tear of the body. Recently, a study by the BBC presenter Michael Mosley concluded that eating less makes one live longer. The Vedic texts explain this phenomenon with help of agnis and the rate at which they consume prana in the body. The agnis, which are constantly at work, cause you to age, even as you think.  People who are very intense, who want to go to the root of every issue, their mind is at work all the time. The thought process consumes the vital prana. It is limited in quantity in each cell. Your batteries (prana) are neither unlimited, nor are they rechargeable. Once it is consumed, the body perishes. For example, Bruce Lee was a fine martial artist but he had a lot of aggression (martial arts are not for showing aggression, rather they are meant for defense). His aggression consumed all the energy of the cell a...