संपूर्ण भगवद गीता कर्म सिद्धांत पर आधारित है। यह हमेशा कहा जाता है कि, "हम जैसा बोते हैं, बिलकुल वैसा ही फल पाते हैं"। जब हम जमीन में बीज बोते हैं तो उस बीज का अंकुरण एवं उससे पैदा होने वाले पौधे की गुणवत्ता उस जमीन के उपजाऊपन पर निर्भर करती है। उसी तरह हमारा हर कर्म फिर चाहे वह कितना ही तुच्छ क्यों न हो, उसमें अंकुरण होने की क्षमता होती है और हम पर उससे होने वाले प्रभाव वह कर्म कैसे एवं कहां किया गया है, इस पर निर्भर करता है। हर कर्म का फल उस कर्म की क्षमता और सूक्ष्मता पर निर्भर करता है और उस घटना एवं इंसान जिसके लिए या जिसके विरुद्ध वह कर्म किया गया हो उनकी क्षमता और सूक्ष्मता पर निर्भर करता है। कर्म की सूक्ष्मता जितनी ज्यादा होती है, उतनी तीव्रता से उस कर्म का फल कर्ता को प्राप्त होता है। उदाहरण के तौर पर यह सलाह हमेशा दी जाती है कि हमें किसी भी आध्यात्मिक रूप से प्रगत व्यक्ति के प्रति विचार, वाणी या आचार में नकारात्मकता नहीं रखनी चाहिए। यह इसलिए नहीं कहा जाता चूंकि ऐसे व्यक्ति अत्यंत अहंकारी होते हैं अपितु इसलिए कहा जाता है क्योंकि आध्यात्मिक रूप से प्रगत व्यक्...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'