आसनों की इस श्रृंखला में हम सनातन क्रिया में निहित प्रारंभिक आसनों की चर्चा करते रहे हैं| इन आसनों का नियमित रूप से अभ्यास करनेवाले को तेजस्वी, स्वस्थ शरीर एवं आकर्षक व्यक्तित्व प्राप्त होता है| चूँकि ये आसन प्राणमाया कोश के स्तर पर कार्य करते हैं, जो कि सनातन क्रिया के नियमित अभ्यास द्वारा उच्चतम श्रेणी प्राप्त होने पर साधक को विभिन्न रंगों के रुप में दिखता है, ये आसन रोग को शरीर में व्यक्त होने ही नहीं देते| अब तक हमने टखने और घुटने के जोड़ों में प्राण के संतुलित प्रवाह हेतु कुछ आसनों पर चर्चा की| अब हम जांघ के जोड़ों के आसनों पर चर्चा करेंगे| अपने पैर सीधे फैलाकर बैठें| अपनी पीठ सीधी रखें और आपने दोनों पैरों और एड़ियों को जोड़ें| अपनी हथेलियों को ज़मीन पर कूल्हों के समीप इस तरह रखें, जिसमें आपके हाथों की अंगुलियाँ आपके शरीर से विपरीत दिशा में हों | अब अपने दाहिने पैर को सीधे रखते हुए, बाएं पैर को मोड़कर उसके टखने को दाहिने पैर की जांघ पर रखें| अपने दाहिने हाथ से अपने बाएं टखने को सहारा दें और अपना बायां हाथ अपने बाएं घुटने पर रखें| फिर श्वास को अंदर लेते हुए अपने...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'