आज के समय में सूक्ष्म शक्तियों के अनुभव का वादा देने वाली तरह-तरह की कलाएँ बाज़ार में देखने को मिलती हैं और ऐसी संस्थाओं की तो बहुतायत है जो योग के नाम पर क्या कुछ बेचती हुई मिलेंगी जो कि एक मनुष्य को जन्म-जन्मान्तर तक भ्रमित करने के लिए पर्याप्त हैं I एक बार मैंने किसी अख़बार के लेख में पढ़ा कि पवन झंकार को दरवाज़े की एक तरफ न लटकाकर , बीचों बीच टाँगना चाहिए, इस प्रकार की बातें सभी तर्कों को पीछे छोड़ देती हैं। लोगों के मन में जो आता है , बिना सोचे समझे उसे कह जाते हैं , लेकिन कहने के पीछे उनका एक उद्देश्य अवश्य होता है - कि कही हुई बातों में कुछ नयापन लगे , कुछ अलग दिखे , क्योंकि नई चीज़ ही तो शीघ्र बिकती है। इस प्रकार की ख़रीद - बेच यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि वास्तव में योग तथा अन्य आध्यात्मिक विज्ञान क्या माया से बाहर निकलने का मार्ग हैं या माया के बंधनों में बंधने का ? योग का व्यावसायीकरण लोग बिना यह जाने कि उन्हें कहाँ जाना है और उन्हें क्या चाहिए , योग के मार्ग पर चल पड़ते हैं और उनमे...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'