पिछले सप्ताह हमने एक सरल श्वास प्रक्रिया की चर्चा की थी जिससे शरीर के चयापचय को अनुकूल किया जा सकता है तथा शरीर की कोशिकाओं के जीवन काल में वृद्धि कर, अपने शरीर के वृद्ध होने की प्रक्रिया को धीमा किया जा सकता हैं। । योग की प्रारंभिक क्रियाओ का यह पहला तत्कालीन लाभ है । आशा है कि पाठकों ने पिछले लेख में वर्णित उदर-श्वास-क्रिया का अभ्यास किया होगा। योग आपके लिए तभी सार्थक है जब आप उसका नियमित रूप से अभ्यास करें क्योंकि योग अनुभव का विषय है, आपका निजी अनुभव । अब हम उदर-श्वास-क्रिया में एक छोटा-सा परिवर्तन करेंगे, १. अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा कर के बैठें। आँखें बंद कर सारा ध्यान नाभि पर रखते हुए उदर श्वास की क्रिया करते रहें। अपने श्वास को धीमा, गहरा और लम्बा करें । २. एक लंबी सांस लें और साँस बाहर छोड़ते समय अपना मुँह खोल राहत की एक सांस छोड़े। यदि आप इस प्रश्वास को जागरूकता के साथ करते है, तो अापको एहसास होगा कि हवाएक हल्की फुफकार के साथ आपके गले के अंदरूनी हिस्सों को छूकर बाहर जाती है । ३. अब यही प्रक्रिया अपने मुंह को बंद करके दोहराएं । प्रत्यक्ष रूप से नासिका छिद्र...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'