वेद सृष्टि का असीम ज्ञान हैं। इनमें निहित तथ्य उतने ही वैज्ञानिक और तार्किक हैं जितने वे प्राचीन और पारंपरिक हैं। वैदिक संस्कृति में समाज को सम्प्रदाय, क्षेत्र, जन्म, रंग-रूप अथवा प्रतिष्ठा के बल पर विभाजित नहीं किया जाता था, ये सभी आधुनिक संकल्पनाएं हैं। अलग-अलग वैदिक ऋषियों ने मानव जाति का दैविक (सभ्य) और आसुरिक (असभ्य) प्रवृत्तियों में वर्गीकरण किया और ये वर्ग सभी संस्कृतियों और सम्प्रदायों में उपस्थित है। यहां तक कि एक ही जीव में अलग-अलग समय और स्थिति में ये दोनों ही प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं। द्वौ भूतसर्गो लोकेअस्मिन्दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरम पार्थ मे शृणु ॥ भगवद गीता १६.६ ॥ भगवान् कृष्ण असुरों के गुणों का अवलोकन करते हुए कहते हैं कि संसार में दो ही प्रकार के जन होते हैं- पहले वे जिनकी प्रवृत्ति दैविक है और दूसरे वे जिनमें आसुरिक प्रवृत्ति प्रबल होती है। आसुरिक प्रवृत्ति के लोगों में विवेक शक्ति, सदाचार और सत्य का अभाव होता है । उनकी विचारधारा विनाशकारी होती है। अन्य जीव जंतुओं को कष्ट व पीड़ा पहुंचाना, कि...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'