वैदिक संस्कृति की परिकल्पना आज से हज़ारो वर्षो पूर्व वैदिक ऋषियों द्वारा की गई थी , जिनका सृष्टिकर्ता के साथ सीधा संपर्क था। महर्षि वेद व्यास जी ने समाज में होने वाले अपकर्ष और संस्कृति पर आने वाले संकट का पूर्वानुमान लगाते हुए वेदों के ज्ञान को पुराणों के माध्यम से हमें 5000 वर्षो पूर्व लिखित रूप में दिया। इन सब पुराणों में ,श्रीमद देवी भागवत में विभिन्न युगों सतयुग ,त्रेतायुग , द्वापरयुग ,कलियुग की विस्तार से व्याख्या की गई है। इस लेख के अनुसार जो मनुष्य धर्म का पालन करते हैं वे सतयुग में जन्म लेते हैं। जिनकी प्रीति धर्म और अर्थ (भौतिक सम्पन्नता ) दोनों में है वे त्रेतायुग में जन्म लेते हैं। जो धर्म, अर्थ और काम (इच्छाएं) तीनो में प्रीती रखते हैं वे द्वापर में जन्म लेते हैं तथा जो सिर्फ अर्थ और काम में लिप्त होते हैं वे कलयुग में जन्म लेते हैं। अत: सतयुग में योग-ज्ञान था, त्रेता में ध्यान के माध्यम से ज्ञान प्राप्त हुआ। द्वापर युग में कर्म प्रधान हुआ और श्री कृष्ण ने गीता के माध्यम से निष्काम कर्म सिखाया। प्रत्येक प्राणी की सहायता अनासक्त होकर करना वर्तमान कलियुग का यो...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'