-योगी अश्विनी यह सृष्टि, हर शासन अधीन कार्य प्रणाली के अनुसार ही, कुछ मूलभूत कानूनों पर आधारित है, जिनका कोई भी उल्लंघन नहीं कर सकता। इसमें कर्म के क़ानून का स्थान सबसे अग्रगण्य है। देवों को भी इस क़ानून का पालन करना अनिवार्य होता है और इससे ऊपर कोई भी नहीं है। आज का आधुनिक मनुष्य जो खुद को सृष्टि से उच्च मानता है और स्वयं के लिए अपन ीही काल्पनिक दुनिया को निर्मिति करने के फिराक में सृष्टि के कानूनों की अवहेलना करता जा रहा है, खुद ही आध्यात्मिक अधोगति के चक्र में उलझकर रह गया है। इस तथ्य का प्रमाण आपको आजकल के मोटे ऐनक पहनने वाली, रीढ़ की झुकी हड्डीवाली, अनुचित पाचन संस्थावाली, यंत्रों और कृत्रिम जीवनशैली की लत लगी हुई युवा पीढ़ी कोदेखकर मिल जायेगा। क्यों? इस प्रश्न का उत्तर कर्म के क़ानून में निहित है। आप जैसा बीज बोओगे, बिलकुल वैसा ही फल पाओगे।आप जितना स्वयं के पास इक_ा करते हैं, उतना ही दर्द और पीड़ा का संचय करते जाते हैं। ऊपर उल्लेख की गई इन समस्याओं से निजाद पाने के लिए कर्म के क़ानून के खिलाफ कार्य करने के बजाय उसके नियमों के अंतर्गत कार्य करना अनिवार्य है। कैसे? अगर ...
Journey of the spirit 'Sanatan Kriya'